कवि विजय कुमार कोसले ने शराब के कारण बिखरते घर परिवारों पर संवेदना जताते हुए समाज को किया जागरूक:: जरूर पढ़े कविता शीर्षक – शराब की बढ़ी जब लत, छीन गई सर के ऊपर से छत

 *शराब की बढ़ी जब* *लत*

छीन गई सर के ऊपर से छत

~ बाप बेटे को एक घर में
लगी शराब की लत ऐसे,
खुब कमा रहे हो दौलत
जीवन में मानो वो जैसे।

~ ना गुजरे एक दिन उनके
जिस दिन न हो पी शराब,
आकर करते फिर घर में
सुख शांति आचरण खराब।

~दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं
 बहुत उनके घर का कर्ज,
खेती बाड़ी सब गिर्वी रख 
 भूल गए हैं अपना फर्ज।

~शराब की नशे में होते हैं
उनके घर हर रोज लड़ाई,
फिर भी गैरों के आगे कैसे
अपना करते खूब बड़ाई।

~ बातें सुनकर ऐसा लगे की
एक भी कभी न बोले झूठ,
और एक भी शाम न गुजरे कभी
जिस दिन न ली शराब की घुट।

~ अंडा मांस मछली वो घर में
कर्ज करके हर रोज खाते,
बढ़ती कर्ज को छुटने फिर
छ: महिना प्रदेश जाते।

~शराब की लत से हो गये हैं
उनके घर की सब कुछ नाश,
बची नहीं है रत्ती भर जमीन
सच भाई जी उनके पास।

~धीरे धीरे शराब की दोनों को
जब लगा बहुत ज्यादा लत,
हालात ने भी तब छीन लिए
उनके सर ऊपर से छत।

~अब गांव छोड़ देश प्रदेश में वो
कैसे जाकर दर दर भटके,
कभी गांव आ जने पर रहते
रोज कर्ज़दाता से बचके।

लेखक / कवि/पत्रकार
विजय कुमार कोसले
नाचनपाली, लेन्ध्रा छोटे
सारंगढ़, छत्तीसगढ़ ।

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