‘हरी झंडी’ का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय

‘हरी झंडी’ का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय

‘हरी झंडी’ का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय


 

आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी

सह संपादक – न्यूज़लाइन नेटवर्क, छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर हाल ही में ‘डायल 112’ के रूप में सुरक्षा और आपातकालीन सेवा का एक नया काफिला उतरा। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ आकर जब इन वाहनों को हरी झंडी दिखाई, तो प्रदेश की जनता को लगा कि अब संकट के समय ‘मदद’ महज एक फोन कॉल की दूरी पर है। लेकिन, इस सरकारी कवायद के महज दो दिनों के भीतर जो दृश्य देखने को मिला, वह जनसेवा से अधिक ‘स्व-प्रचार’ और ‘उद्घाटनजीवी’ मानसिकता का एक ऐसा प्रहसन है, जो लोकतंत्र में मितव्ययिता के दावों को आईना दिखाता है।

 

सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ के उन जिला मुख्यालयों में वाहन इसलिए नहीं चल सकते थे क्योंकि वहां के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने उसे ‘पुनः हरी झंडी’ नहीं दिखाई थी? क्या दिल्ली से आई हरी झंडी का महत्व स्थानीय स्तर पर तब तक शून्य रहता है, जब तक कि वह किसी स्थानीय मंत्री या विधायक के हाथ से दोबारा न फहराई जाए?

यह स्थिति किसी हास्यास्पद फिल्म के दृश्य जैसी प्रतीत होती है, जहाँ पटकथा में तार्किक चूक हो। ऐसा लगता है कि इन वाहनों के इंजन का ‘स्टार्ट बटन’ चाबी से नहीं, बल्कि स्थानीय नेताओं के हाथों में थमी उस हरी झंडी से संचालित होता है। यदि व्यवस्था वाकई इतनी ही जटिल है, तो फिर केंद्रीय मंत्री का आगमन मात्र एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह प्रश्न अनुत्तरित है कि आखिर केंद्रीय मंत्री के आगमन का ‘औचित्य’ क्या था—क्या वे केवल फोटो खिंचवाने आए थे या सरकारी व्यवस्था को सुदृढ़ करने?

 

किसी भी सरकारी आयोजन में मंच, बैनर, प्रचार-प्रसार और प्रशासनिक अमले की उपस्थिति के लिए सरकारी खजाने का व्यय होता है। एक बार केंद्रीय गृह मंत्री के हाथों उद्घाटन के बाद, जिलों में वही रस्म फिर से दोहराना न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि करदाताओं के धन का खुला दुरुपयोग भी है।

संवाद और संवादहीनता के बीच का यह फासला जनता समझ रही है। जब जनप्रतिनिधि जनसेवा से ज्यादा ‘रिबन कटिंग’ और ‘फ्लैग ऑफ’ में रुचि दिखाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि वे विकास के बजाय ‘दृश्यता’ की दौड़ में शामिल हो गए हैं। क्या जनता के पास इन व्यर्थ के आयोजनों का हिसाब मांगने का अधिकार नहीं है?

 

क्या यह केंद्रीय नेतृत्व के प्रति एक प्रकार की अरुचि या अनादर का प्रदर्शन है—यह राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हो सकता है।

जब केंद्रीय गृह मंत्री की पहल को स्थानीय स्तर पर ‘पुनः प्रमाणित’ करने की होड़ मचे, तो यह एक प्रकार के ‘सत्ता के संघर्ष’ या ‘क्रेडिट वॉर’ को जन्म देता है।

यह व्यवहार केंद्रीय गृह मंत्री की गरिमा को कम करे या न करे, लेकिन यह स्थानीय नेताओं की उस ‘आत्ममुग्धता’ को जरूर प्रदर्शित करता है जहाँ वे खुद को व्यवस्था का केंद्र मान बैठे हैं। यदि यह महज जनसम्पर्क का एक प्रयास है, तो यह अत्यंत भोंडा है,और यदि यह केंद्रीय नेतृत्व के कद को छोटा दिखाने की कोई सुनियोजित रणनीति है, तो यह राजनीतिक अपरिपक्वता का चरमोत्कर्ष है।

 

अंततः, छत्तीसगढ़ की सड़कों पर दौड़ने वाली ये गाड़ियाँ जनता के लिए हैं, नेताओं के ‘फोटो-ऑप्स’ के लिए नहीं। यदि ये वाहन हरी झंडी दिखाए जाने के इंतजार में जिलों में खड़े रहे, तो यह प्रशासनिक विफलता है।

राजनीतिक शुचिता का तकाजा यह है कि नेता अपनी ‘विजिबिलिटी’ के बजाय ‘एक्सेसिबिलिटी’ पर ध्यान दें। जनता को हरी झंडी देखने में कोई दिलचस्पी नहीं है, उसे दिलचस्पी है तो इस बात में कि 112 डायल करने पर पुलिस या एम्बुलेंस कितनी जल्दी उसके दरवाजे पर पहुंचती है।

समय आ गया है कि हमारी राजनीति ‘हरी झंडी’ के प्रतीकों से ऊपर उठकर, जमीन पर उतरने वाले वास्तविक ‘कार्यों’ पर केंद्रित हो। वरना, जनता भी जल्द ही यह समझ जाएगी कि यह ‘डायल 112’ की सेवा कम और नेताओं के ‘शो’ का प्रदर्शन ज्यादा था।

सह संपादक - न्यूज़लाइन नेटवर्क

      लेखक : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी  (सह-संपादक)

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