शासन की ‘पंगुता’ और जनता का ‘पुरुषार्थ’: सैयाभाठा के ग्रामीणों ने खुद ही जोड़ लिए विकास के तार


न्यूजलाइन नेटवर्क,डेस्क ब्यूरो
बलौदाबाजार: विकास की दौड़ में जब सरकारी तंत्र ‘थक’ कर बैठ जाए, तो क्या किया जाए? सैयाभाठा के ग्रामीणों ने इसका जवाब किसी आवेदन या अनशन से नहीं, बल्कि अपने पसीने और आत्मसम्मान से दिया है। वनांचल की गोद में बसे इस गांव की जीवनरेखा कहे जाने वाली बालमदेई नदी की पुलिया, जो पिछले छह वर्षों से सरकारी फाइलों में ‘मरम्मत’ की बाट जोह रही थी, अंततः ग्रामीणों के श्रमदान से जीवंत हो उठी है।

जिला मुख्यालय को जोड़ने वाली यह सड़क सैयाभाठा के लिए महज एक रास्ता नहीं, बल्कि मुख्यधारा से जुड़ने का जरिया थी। किंतु, छह साल पहले ढही पुलिया ने ग्रामीणों को एक अनचाहे ‘वनवास’ पर धकेल दिया था। वन विभाग की देहरी से लेकर जनप्रतिनिधियों के दरबार तक, ग्रामीणों ने अपनी व्यथा की अर्जी लगाई। चप्पलों के तलवे घिस गए, पत्रों के ढेर लग गए, मगर रसूखदार फाइलों ने कभी हिलने की जहमत नहीं उठाई। आलम यह रहा कि जिम्मेदार कुंभकर्णी निद्रा में लीन रहे और पुलिया का जर्जर ढांचा व्यवस्था की विफलता पर मौन चीखता रहा।
कहते हैं कि अभाव में ही नवाचार जन्म लेता है। जब सरकारी नुमाइंदों के कानों पर जूं नहीं रेंगी, तो सैयाभाठा के ग्रामीणों ने स्वयं ही ‘सरकार’ बनने का निर्णय लिया। चंदा इकट्ठा हुआ, किसी ने ईंटें दीं, तो किसी ने अपने शरीर की ऊर्जा (श्रमदान) का निवेश किया। जो काम छह वर्षों में ‘विभागीय बजट’ नहीं कर सका, उसे ग्रामीणों ने कुछ ही दिनों में अपने दृढ़ संकल्प से कर दिखाया।
“सरकारी तंत्र की बेरुखी और ग्रामीणों की जिजीविषा के बीच का यह फासला ही आज के विकास का असली आइना है। जहाँ शासन के पास ‘पुल’ बनाने का समय नहीं था, वहाँ ग्रामीणों ने अपने हौसलों से ‘सेतु’ निर्मित कर दिया।”
आज बालमदेई नदी की वही पुलिया, जो कल तक हादसों को निमंत्रण देती थी, अब बच्चों के कदमों की आहट से गुलजार है। स्कूल जाते हुए बच्चों को सुरक्षित पुल पार करते देख ग्रामीणों के चेहरे पर जो संतोष है, वह करोड़ों के सरकारी विज्ञापनों से कहीं अधिक कीमती है।
परंतु, प्रश्न तो उन ‘जिम्मेदारों’ की कार्यप्रणाली पर भी उठता है, जिनकी कुर्सी सैयाभाठा की इसी पुलिया से होकर गुजरती है। क्या यह पुलिया महज पत्थरों का एक ढांचा है, या यह उन राजनेताओं और अधिकारियों के ‘नैतिक पतन’ का स्मारक है, जो छह साल तक जनता के दुख पर चुप्पी साधे बैठे रहे?सैयाभाठा के ग्रामीणों ने यह साबित कर दिया है कि यदि समाज ठान ले, तो वह नदी की धारा भी मोड़ सकता है। प्रशासन के लिए यह एक तमाचा भी है और सबक भी—कि विकास कागजों की स्याही से नहीं, जनता के भरोसे से लिखा जाता है।

