‘प्रशिक्षण’ या ‘पतियों की पंचायत’? जिला पंचायत के कार्यक्रम में नियम-कानून ताक पर!

‘प्रशिक्षण’ या ‘पतियों की पंचायत’? जिला पंचायत के कार्यक्रम में नियम-कानून ताक पर!

‘प्रशिक्षण’ या ‘पतियों की पंचायत’? जिला पंचायत के कार्यक्रम में नियम-कानून ताक पर!

न्यूजलाइन नेटवर्क, मुंगेली ब्यूरो 
मुंगेली: सशक्त पंचायत और आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत का सपना दिखाने वाली सरकार की योजनाओं पर ‘पति-प्रतिनिधियों’ का कब्जा होता नजर आ रहा है। मुंगेली जिला पंचायत द्वारा हाल ही में ‘राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान’ के तहत आयोजित जिला पंचायत सदस्यों के दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में जो तस्वीर सामने आई है, वह सरकारी नियमों के मुंह पर करारा तमाचा है। जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी तस्वीर में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि निर्वाचित महिला सदस्यों के स्थान पर उनके पति प्रशिक्षण में न केवल हिस्सा ले रहे हैं, बल्कि व्यवस्था पर भी काबिज दिख रहे हैं।

पंचायती राज अधिनियम के तहत, जनता द्वारा चुनी गई प्रतिनिधि ही बैठक में भाग लेने, निर्णय लेने और प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अधिकृत होती है। नियमों के अनुसार, यह प्रशिक्षण विशेष रूप से उन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए है जिन्हें जनता ने चुना है, ताकि वे प्रशासनिक बारीकियों, विकास कार्यों और वित्तीय प्रबंधन को समझ सकें। इसमें अनधिकृत व्यक्ति की उपस्थिति का कोई प्रावधान नहीं है।

किसी भी महिला जनप्रतिनिधि के स्थान पर उनके पति का कार्य करना या बैठकों में भाग लेना ‘पंचायत प्रतिनिधि’ की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
प्रशिक्षण जैसे आधिकारिक कार्यक्रमों में, जहां जिला पंचायत के उप संचालक जैसे जिम्मेदार अधिकारी उपस्थित थे, वहां पतियों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि प्रशासन भी इस अवैध ‘प्रॉक्सी संस्कृति’ को बढ़ावा दे रहा है।

फोटो में महिला सदस्यों के बजाय पतियों की उपस्थिति यह सवाल खड़े करती है कि क्या महिला सदस्य केवल नाम की हैं? यदि प्रशिक्षण महिला सदस्यों को दिया जाना था,तो उनके पति वहां क्या कर रहे थे? क्या अधिकारी यह नहीं जानते कि प्रशिक्षण में किसी भी बाहरी या अनधिकृत व्यक्ति की उपस्थिति नियमों के विपरीत है?

विकास की मुख्यधारा में महिलाओं को जोड़ने के लिए सरकार करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सत्ता की बागडोर आज भी पुरुष प्रधान मानसिकता के हाथों में है। यदि प्रशिक्षण में पतियों को शामिल होने की अनुमति दी गई, तो क्या जिला पंचायत प्रशासन ने इसके लिए कोई लिखित आदेश जारी किया था? या फिर यह मनमानी का खेल है?

जब प्रशिक्षण के दौरान ही नियम नहीं माने जा रहे, तो पंचायत के विकास कार्यों में पारदर्शिता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? जिला प्रशासन को इस घटना का संज्ञान लेते हुए स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर किन नियमों के तहत प्रशिक्षण शिविर को ‘पतियों की पाठशाला’ बना दिया गया?

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