विद्युत वीरों का जानलेवा ‘जुगाड़’: यमराज को ठेंगा दिखाता हमारा बिजली विभाग

विद्युत वीरों का जानलेवा ‘जुगाड़’: यमराज को ठेंगा दिखाता हमारा बिजली विभाग

विद्युत वीरों का जानलेवा ‘जुगाड़’: यमराज को ठेंगा दिखाता हमारा बिजली विभाग

लेखक: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़ 8120032834

भारत को आत्मनिर्भरता के शिखर पर ले जाने का स्वप्न देखने वाले इस दौर में, यदि आप अदम्य साहस, अद्वितीय इंजीनियरिंग और साक्षात चमत्कार देखना चाहते हैं, तो किसी भी शहर या गांव के चौराहे पर चले जाइए। वहाँ आपको खाकी या साधारण कपड़ों में लिपटा, पैरों में हवाई चप्पल पहने और हाथ में एक साधारण पलास थामे एक ‘विद्युत वीर’ (लाइनमैन) जर्जर खंभे पर बंदर की फुर्ती से चढ़ता हुआ दिखाई देगा। बिना किसी सुरक्षा बेल्ट, दस्ताने या आधुनिक उपकरणों के, ११ हजार वोल्ट की नंगी तारों के बीच झूलते इन जांबाजों को देखकर लगता है कि हमारे देश में विज्ञान भले ही बाद में आया हो, पर ‘जुगाड़ तकनीक’ का आविष्कार ईश्वरीय वरदान की तरह पहले ही हो चुका था।

हमारी विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के लिए सुरक्षा उपकरण मानो एक ऐसी विदेशी या पौराणिक अवधारणा हैं, जिसका जिक्र सिर्फ फाइलों और टेंडर की फाइलों में ही अच्छा लगता है। दस्ताने, हेलमेट, इंसुलेटेड जूते और सुरक्षा बेल्ट जैसी चीजें इतनी ‘पवित्र’ मानी जाती हैं कि उन्हें गोदामों के लॉकर में बंद करके रखा जाता है, ताकि वे फील्ड में जाकर गंदी न हो जाएं।
विभागीय अधिकारियों का शायद यह दृढ़ विश्वास है कि आधुनिक तकनीक और सुरक्षा उपकरण केवल कायरों के लिए होते हैं; असली भारतीय लाइनमैन तो अपनी ‘छठी इंद्री’ और विभागीय भरोसे के बल पर बिजली के झटकों को भी मात दे सकता है।

जब एक कर्मचारी बिना शटडाउन (या तथाकथित शटडाउन) के खंभे पर चढ़ता है, तो वह केवल बिजली की मरम्मत नहीं कर रहा होता, बल्कि यमराज के साथ ‘शतरंज का खेल’ खेल रहा होता है। ऊपर से आदेश आता है—”काम जल्दी निपटाओ, वीआईपी इलाके की बत्ती गुल है। मंत्री जी के यहां लाइट बंद हो गई है” नीचे खड़ा सहायक चिल्लाता है—”साहब, करंट तो बंद है ना?” और ऊपर चढ़ा हुआ कर्मचारी अपनी जान हथेली पर रखकर तारों को ऐसे छूता है जैसे कोई सूफी संत खुदा की इबादत कर रहा हो।
दुर्घटना होने पर जब कोई ‘विद्युत वीर’ हमेशा के लिए शांत हो जाता है, तब विभाग की सक्रियता देखने लायक होती है। तुरंत एक जांच कमेटी बैठाई जाती है, जिसका एकमात्र उद्देश्य यह साबित करना होता है कि मृतक ने ‘लापरवाही’ बरती थी। फ़ाइलों के पेट भर दिए जाते हैं, मुआवजे की घोषणाओं के लॉलीपॉप थमा दिए जाते हैं, और फिर एक नया ‘बलि का बकरा’ उसी खंभे पर बिना दस्तानों के चढ़ा दिया जाता है।

हम ५जी (5G) तकनीक के युग में जी रहे हैं, जहाँ रोबोटिक सर्जरी हो रही है और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से दुनिया संचालित हो रही है। परंतु, हमारे बिजली विभाग का तकनीकी विकास आज भी ‘काली सेलोटेप’ और ‘लोहे के पलास’ पर आकर ठिठक जाता है।
विभागीय बजट में आधुनिक हाइड्रोलिक क्रेन, फॉल्ट डिटेक्टर और अत्याधुनिक टूलकिट्स के लिए जगह हो न हो, पर नए दौर के विज्ञापनों और कागजी दावों के लिए करोड़ों रुपये का प्रावधान हमेशा रहता है। कागजों पर बिजली विभाग इतना आधुनिक है कि बटन दबाते ही फॉल्ट ठीक हो जाता है, मगर हकीकत में आज भी खंभे को हिलाकर देखना पड़ता है कि करंट आ रहा है या नहीं।

यह बेहद गंभीर और विचारणीय प्रश्न है कि आखिर कब तक व्यवस्था की इस आपराधिक लापरवाही को ‘कर्मचारियों की बहादुरी’ का नाम देकर महिमामंडित किया जाता रहेगा? क्या किसी गरीब लाइनमैन की जिंदगी की कीमत इतनी सस्ती है कि उसे बिना न्यूनतम सुरक्षा के मौत के कुएं में धकेल दिया जाए?
सड़कें चमचमा रही हैं, दफ्तर वातानुकूलित हो रहे हैं, लेकिन जो इस समूची व्यवस्था को ऊर्जा दे रहा है, वह खुद अंधेरे और मौत के साए में जीने को मजबूर है। अब समय आ गया है कि कागजी शटडाउन के बजाय तंत्र अपनी संवेदनहीनता पर ‘शटडाउन’ लगाए और इन विद्युत कर्मियों को उनके बुनियादी अधिकार और सुरक्षा उपकरण मुहैया कराए, ताकि किसी घर का उजाला बनाए रखने की कीमत किसी मां के लाल की जिंदगी से न चुकानी पड़े।

CATEGORIES
Share This

COMMENTS

Wordpress (0)
Disqus (0 )