बस्तर में विकास की ‘धरती आबा’ दृष्टि और जनजातीय संवेदनशीलता

बस्तर में विकास की ‘धरती आबा’ दृष्टि और जनजातीय संवेदनशीलता

लेखक: डॉ. रूपेन्द्र कवि
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ को लेकर चर्चाएं तेज हैं। विकास का यह सरकारी खाका बुनियादी सुविधाओं के विस्तार का वादा तो करता है, लेकिन क्या हम उन सामाजिक-सांस्कृतिक बारीकियों को समझ पा रहे हैं, जो बस्तर की आत्मा हैं?
बस्तर महज एक भौगोलिक मानचित्र नहीं, बल्कि गोंड, मुरिया, माड़िया, धुरवा, भतरा और हल्बा जैसी जनजातियों का एक जीवंत सांस्कृतिक परिदृश्य है। यहाँ का समाज प्रकृति, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक सामूहिकता के धागों से बुना गया है। ऐसे में ‘धरती आबा’ अभियान की सफलता केवल सड़कों, आवासों या पेयजल की पाइपलाइनों की संख्या से नहीं मापी जा सकती।
मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो बस्तर में आज भी विकास मॉडल काफी हद तक ‘ऊपर से नीचे’ (top-down) थोपा गया प्रतीत होता है। यद्यपि धरातल पर बुनियादी ढांचों में विस्तार हुआ है, लेकिन ग्राम सभाओं की भागीदारी अभी भी औपचारिक अधिक और प्रभावी कम है। विकास की प्रक्रिया तब तक अधूरी है, जब तक उसमें स्थानीय समुदाय की आवाज शामिल न हो। जेम्स सी. स्कॉट जैसे विचारकों ने बार-बार चेताया है कि राज्य की नीतियां अक्सर स्थानीय ज्ञान की अनदेखी कर बैठती हैं, जिससे विकास के बावजूद समाज में एक खालीपन रह जाता है।
बस्तर के दुर्गम इलाकों में आज भी विकास की गति प्रशासनिक जटिलताओं और भौगोलिक बाधाओं के कारण धीमी है। एक बड़ी चुनौती प्रशासनिक ढांचे और जनजातीय सांस्कृतिक संदर्भों के बीच समन्वय की है। यदि हम चाहते हैं कि बस्तर का विकास स्थायी हो, तो हमें ‘विकास के मॉडल’ को जनजातीय जीवन-शैली के अनुकूल ढालना होगा।
‘धरती आबा’ अभियान को एक ‘जन-आंदोलन’ का रूप देने के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं:
निर्णय प्रक्रिया में ग्राम सभा की सर्वोच्चता: ग्राम सभा को महज सूचना प्राप्त करने का माध्यम न बनाकर उसे नीति-निर्माण की केंद्र बिंदु बनाया जाए।
सांस्कृतिक समावेश: नीतियां स्थानीय भाषा, परंपराओं और मान्यताओं के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए।
सामुदायिक ऑडिट: योजनाओं के क्रियान्वयन का मूल्यांकन स्वयं समुदाय द्वारा हो, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
युवा और महिला नेतृत्व: भविष्य के विकास को गति देने के लिए स्थानीय युवा और महिला समूहों को मुख्य धारा की निर्णय प्रक्रिया में लाना अनिवार्य है।
बस्तर का विकास केवल ‘भौतिक उपलब्धियों’ का लेखा-जोखा नहीं होना चाहिए। यह उस विकास की यात्रा होनी चाहिए जो सम्मानजनक हो, समावेशी हो और जिसका आधार ‘सहभागी विकास’ का सिद्धांत हो। यदि हम बस्तर के जनमानस के साथ संवाद स्थापित कर, उनके पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विकास के साथ जोड़ सकें, तभी ‘धरती आबा’ का संकल्प सार्थक होगा।

