आज के वर्तमान परिस्थिति में देश के अन्नदाता, अमीर-गरीब के पेट भरता,साधारण और गरीब किसानों की ताज़ा हाल को अभिव्यक्त करते अवश्य पढ़ें जनकवि विजय कुमार कोसले जी के शासन-प्रशासन को खबरदार कर रहे एक मार्मिक छत्तीसगढ़ी कविता रचना – “मोर किसान के दुःख”

आज के वर्तमान परिस्थिति में देश के अन्नदाता, अमीर-गरीब के पेट भरता,साधारण और गरीब किसानों की ताज़ा हाल को अभिव्यक्त करते अवश्य पढ़ें जनकवि विजय कुमार कोसले जी के शासन-प्रशासन को खबरदार कर रहे एक मार्मिक छत्तीसगढ़ी कविता रचना – “मोर किसान के दुःख”

आज के वर्तमान परिस्थिति में देश के अन्नदाता, अमीर-गरीब के पेट भरता,साधारण और गरीब किसानों की ताज़ा हाल को अभिव्यक्त करते अवश्य पढ़ें जनकवि विजय कुमार कोसले जी के शासन-प्रशासन को खबरदार कर रहे एक मार्मिक छत्तीसगढ़ी कविता रचना – “मोर किसान के दुःख”।

🌾 *!! मोर किसान के दुःख !!* 🌾
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जेकर धरम-करम ल उपजे,
खेत-डोली म धान,
अमीर-गरीब के पेट भरैय्या,
मैं हौं एक किसान।

चटनी-मटनी म रोटी-भात,
रोज बिहना खाथौ,
गरीब किसान हौं मैं भाई,
मर-मर के कमाथौ।

मोर थोकन हे खेत-डोली,
जेमा धान लगाथौ,
बने पाय के आश म जेकर,
सपना ल सजाथौ।

घाम-पानी अउ जाड़-सीत म,
जांगर ल चलाथौ,
आनी-बानी दुःख-दरद ल,
अंतस म दबाथौ।

गहना धर के सोन-चांदी ल,
खातू-बीज मंगाथौ,
दवाई-माटी के महंगा दाम,
बनिया ल धराथौ।

मजबूरी म खरी-खातू ल,
डबल रेट बिसाथौ,
मिठलबरा सरकार बने के,
किमत ल चूकाथौ।

बाढ़-पुरा अउ दिन-दुकाल म,
मैं हं तो घबराथौ,
नईए कोनो गरीब के हितवा,
गुन-गुन के बिसराथौ।

_जनकवि,_


विजय कुमार कोसले
नाचनपाली, सारंगढ़
छत्तीसगढ़

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