आध्यात्मिक आभा में सजी सादगी 17 युगलों का मंगलमय वैवाहिक बंधन !
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आजमगढ़ / संत निरंकारी सत्संग भवन हरबंशपुर आजमगढ़ जोन 61 से मीडिया सहायक डॉ. वीरेंद्र कुमार सरोज ने जानकारी देते हुए कहा कि मानवता, एकत्व एवं आध्यात्मिक आदर्शों के पावन संदेश को साकार करते हुए संत निरंकारी मिशन द्वारा दिल्ली के बुराड़ी रोड स्थित ग्राउंड नं. 8 में अत्यंत गरिमामय एवं आध्यात्मिक वातावरण में सादा सामूहिक विवाह समारोह आयोजित किया गया। यह दिव्य अवसर परम श्रद्धेय सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी की कृपामयी उपस्थिति एवं आशीर्वाद से आलोकित हुआ। इस पावन आयोजन में 17 नवयुगलों ने एक ही स्थल पर वैवाहिक सूत्र में बंधकर अपने नवजीवन का शुभारंभ किया। सभी दंपत्तियों ने सतगुरु के आशीर्वाद से प्रेम और समर्पण के साथ गृहस्थ जीवन की नई यात्रा प्रारंभ की। यह समारोह सरलता, समानता, सौहार्द और आध्यात्मिक मूल्यों का प्रेरणादायी उदाहरण बना।
भक्ति-रस से ओतप्रोत वातावरण में जयमाला, सांझा हार एवं निरंकारी लावों के मधुर गायन के साथ विवाह संपन्न हुआ। इस अवसर पर इंग्लैंड, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश से सम्मिलित हुए युगल परिणय सूत्र में बंधे। इस अवसर पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने नवदंपत्तियों को आशीर्वाद देते हुए फरमाया कि आज का यह सुंदर अवसर केवल 17 जोड़ों का विवाह नहीं, बल्कि परिवारों के सच्चे मिलन का प्रतीक है। ये वे आत्माएँ हैं जो पहले ही निरंकार से जुड़कर एक हो चुकी हैं और आज इस पावन बंधन में बंधकर एक परिवार का रूप ले रही हैं। यह प्रेम और एकता का रूप है, जो जीवन के हर पल में बना रहे तभी सच्चे अर्थों में जीवनसाथी एक-दूसरे को प्रेम दे पाएंगे। विवाह का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों को मिलकर निभाना है। जिस प्रकार यह सांझा हार है, ठीक वैसे ही यह रिश्ता भी सांझेदारी का एक प्रतीक है, जहां बिना किसी भेदभाव के, दोनों एक इकाई बनकर कंधे से कंधा मिलाकर जीवन के हर कर्तव्य को निभाएं। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाज के प्रति भी अपनी भूमिका को समझें। यदि किसी एक जीवनसाथी का रूझान सेवा, सत्संग और सुमिरन से कम होने लगे, तो दूसरे का कर्तव्य है कि उसे प्रेरित करे। जब दोनों मिलकर आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन में संतुलन बनाते हैं, तभी यह मिलन पूर्णता को प्राप्त करता है। अंत में सतगुरु माता जी ने सभी नव युगलों के लिए प्रार्थना करते हुए कहा कि दातार सभी को खुशियाँ प्रदान करे, और हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों को उतनी ही प्राथमिकता दे जितनी वह अपने अधिकारों को देता है। यही सोच एक सशक्त, प्रेमपूर्ण और संतुलित जीवन का आधार बनती है। निःसंदेह यह आयोजन प्रत्येक परिवार एवं उपस्थित जन के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव रहा, जिसने यह संदेश दिया कि सरलता और समर्पण ही सुखी एवं सफल जीवन की वास्तविक नींव है।
भक्ति-रस से ओतप्रोत वातावरण में जयमाला, सांझा हार एवं निरंकारी लावों के मधुर गायन के साथ विवाह संपन्न हुआ। इस अवसर पर इंग्लैंड, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश से सम्मिलित हुए युगल परिणय सूत्र में बंधे। इस अवसर पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने नवदंपत्तियों को आशीर्वाद देते हुए फरमाया कि आज का यह सुंदर अवसर केवल 17 जोड़ों का विवाह नहीं, बल्कि परिवारों के सच्चे मिलन का प्रतीक है। ये वे आत्माएँ हैं जो पहले ही निरंकार से जुड़कर एक हो चुकी हैं और आज इस पावन बंधन में बंधकर एक परिवार का रूप ले रही हैं। यह प्रेम और एकता का रूप है, जो जीवन के हर पल में बना रहे तभी सच्चे अर्थों में जीवनसाथी एक-दूसरे को प्रेम दे पाएंगे। विवाह का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों को मिलकर निभाना है। जिस प्रकार यह सांझा हार है, ठीक वैसे ही यह रिश्ता भी सांझेदारी का एक प्रतीक है, जहां बिना किसी भेदभाव के, दोनों एक इकाई बनकर कंधे से कंधा मिलाकर जीवन के हर कर्तव्य को निभाएं। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाज के प्रति भी अपनी भूमिका को समझें। यदि किसी एक जीवनसाथी का रूझान सेवा, सत्संग और सुमिरन से कम होने लगे, तो दूसरे का कर्तव्य है कि उसे प्रेरित करे। जब दोनों मिलकर आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन में संतुलन बनाते हैं, तभी यह मिलन पूर्णता को प्राप्त करता है। अंत में सतगुरु माता जी ने सभी नव युगलों के लिए प्रार्थना करते हुए कहा कि दातार सभी को खुशियाँ प्रदान करे, और हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों को उतनी ही प्राथमिकता दे जितनी वह अपने अधिकारों को देता है। यही सोच एक सशक्त, प्रेमपूर्ण और संतुलित जीवन का आधार बनती है। निःसंदेह यह आयोजन प्रत्येक परिवार एवं उपस्थित जन के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव रहा, जिसने यह संदेश दिया कि सरलता और समर्पण ही सुखी एवं सफल जीवन की वास्तविक नींव है।
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