लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और प्रशासन के बीच ‘सूचना का अवरोध’: क्या जनप्रतिनिधियों की जानकारी साझा करना आरटीआई की परिधि में है?

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और प्रशासन के बीच ‘सूचना का अवरोध’: क्या जनप्रतिनिधियों की जानकारी साझा करना आरटीआई की परिधि में है?

जानकारी चाहिए तो आरटीआई (RTI) लगाइए’ – जनपद पंचायत सीईओ भोंसले

न्यूजलाइन नेटवर्क , मुंगेली ब्यूरो

मुंगेली : लोकतंत्र में सूचना का अधिकार और पारदर्शिता केवल प्रशासनिक शब्द नहीं, बल्कि जनभागीदारी की आधारशिला हैं। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जनपद पंचायत में हाल ही में एक ऐसा वाकया सामने आया है, जिसने जनहित में कार्यरत पत्रकारों और प्रशासन के बीच संवादहीनता की एक लकीर खींच दी है।

मुंगेली जनपद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विभिन्न ग्राम पंचायतों के सरपंचों से संपर्क हेतु स्थानीय पत्रकारों ने जनपद पंचायत सीईओ भोंसले से सरपंचों की अद्यतन संपर्क सूची साझा करने का आग्रह किया था। पत्रकारों का उद्देश्य स्पष्ट था—क्षेत्र की जमीनी समस्याओं को जनप्रतिनिधियों तक पहुँचाना और विकास कार्यों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग करना। किंतु, प्रशासनिक प्रमुख ने इस आग्रह को सिरे से नकारते हुए यह फरमान सुना दिया कि ‘जानकारी चाहिए तो आरटीआई (RTI) लगाइए’।

प्रशासनिक अधिकारियों का यह रुख कानूनी रूप से बहस का विषय है। ‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005’ की धारा 4(1)(b) स्पष्ट रूप से कहती है कि प्रत्येक लोक प्राधिकरण को अपने संगठन, कार्यों और कर्तव्यों की जानकारी स्वतः प्रकाशित करनी चाहिए। सरपंच एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं, न कि कोई निजी व्यक्ति। ऐसे में, सार्वजनिक पद पर आसीन प्रतिनिधियों का संपर्क विवरण सार्वजनिक सूचना की श्रेणी में आता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि लोक सेवकों द्वारा इस प्रकार की सूचनाओं को ‘गोपनीयता’ के घेरे में रखना पारदर्शिता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। जब उद्देश्य लोक-कल्याणकारी हो, तो प्रशासन का दायित्व सूचना को सुगम बनाना है, न कि उसे जटिल कानूनी प्रक्रियाओं (आरटीआई) के जाल में उलझाना।

लोकतंत्र के उपवन में, ‘सूचना’ वह जल है जिससे विकास की बेल फलती-फूलती है। पत्रकार उस पहरेदार की भाँति हैं जो जन-आकांक्षाओं को सत्ता के गलियारों तक पहुँचाते हैं। आज जब यह सेतु ढहने लगे और सत्ता की देहरी पर बैठे अधिकारी ‘नियमों’ का हवाला देकर सूचना के प्रवाह को रोकने लगें, तो प्रश्न उठता है कि—क्या लोकतंत्र की पारदर्शिता अब फाइलों की धूल में दफन हो रही है?
अधिकारियों की यह ‘मौन स्वीकृति’ या ‘आरटीआई की अनिवार्यता’ मात्र एक प्रशासनिक उत्तर नहीं, बल्कि उस संवाद को कुचलने का प्रयास है जो सत्ता और समाज के बीच की दूरी कम करता है। मुंगेली के संदर्भ में यह घटना न केवल सूचना के अधिकार का प्रश्न है, बल्कि यह उस जड़ता पर प्रहार भी है जो पारदर्शी शासन की राह में सबसे बड़ी बाधा है।

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