परीक्षाओं का ‘महाकुंभ’ और भविष्य का ‘मृगतृष्णा’

परीक्षाओं का ‘महाकुंभ’ और भविष्य का ‘मृगतृष्णा’

लेखक : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (सह संपादक -दैनिक न्यूजलाइन नेटवर्क,छत्तीसगढ़)

भारतीय युवा की नियति अब एक अजीबोगरीब चक्रव्यूह में फँस गई है। यदि महाभारत में अर्जुन के पास लक्ष्य भेदने का कौशल था, तो आज के युवा के पास केवल ‘प्रवेश पत्र’ है—एक ऐसा कागज, जो इस बात की गारंटी तो नहीं देता कि परीक्षा होगी, लेकिन इस बात का पक्का सबूत जरूर देता है कि वह फिर से छले जाने वाला है।
पिछले कुछ समय से देश में परीक्षाओं के आयोजन का अर्थ ‘मेधा की परख’ नहीं, बल्कि ‘धैर्य की परीक्षा’ रह गया है। NEET जैसी प्रतिष्ठित प्रवेश परीक्षा से लेकर SSC GD जैसी सरकारी नौकरियों की सीढ़ियों तक, पेपर लीक का जो दौर चला है, उसने एक नया ‘नेशनल रिकॉर्ड’ बना दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अब सरकार की प्राथमिकता रोजगार सृजन नहीं, बल्कि ‘परीक्षा प्रबंधन’ है। पहले परीक्षा का आयोजन होता है, फिर प्रश्नपत्र बाजार में ‘नीलामी’ के लिए उपलब्ध होता है, और अंत में सरकार ‘पवित्रता’ बनाए रखने के नाम पर परीक्षा रद्द कर देती है।
यह एक ऐसा ‘रद्द-चक्र’ है, जहाँ युवा अपनी ऊर्जा, पैसा और जवानी झोंक देते हैं, और बदले में उन्हें मिलता है—फिर से आवेदन करने का ‘सुनहरा अवसर’।
विडंबना देखिए, जिस उम्र में युवाओं को राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देना चाहिए, वे सड़कों पर उतरकर ‘न्याय’ की मांग कर रहे हैं। सरकार के गलियारों में इसे ‘अव्यवस्था’ नहीं, शायद ‘प्रशासनिक सतर्कता’ कहा जाता होगा। जब पेपर लीक होता है, तो सिस्टम अपनी पीठ थपथपाता है कि “हमने समय रहते इसे पकड़ लिया”। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में मरीज को मारने के बाद कहे कि “सर्जरी तो सफल रही, बस मरीज मर गया।”
सरकारी आंकड़ों में रिक्तियों की संख्या जितनी तेजी से नहीं बढ़ती, उससे कहीं अधिक तेजी से ‘रद्द की गई परीक्षाओं’ की सूची लंबी हो रही है। ऐसा लगता है कि अब ‘परीक्षा रद्द करना’ ही सबसे बड़ा रोजगार बन गया है। इसमें पूरी मशीनरी व्यस्त है—प्रश्नपत्र बनाने से लेकर, उसे लीक करने, फिर रद्द करने और अंत में दोबारा परीक्षा की तारीख तय करने तक।
क्या यह देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है? जब शिक्षा और रोजगार की प्रक्रिया ही ‘अविश्वसनीयता’ के बोझ तले दब जाए, तो राष्ट्र की प्रगति का पहिया भला कैसे घूमेगा? युवाओं के आक्रोश को केवल ‘सड़कों पर प्रदर्शन’ मानकर खारिज कर देना सरकार की बड़ी भूल होगी। उन्हें सड़कों पर उतरना नहीं, बल्कि पुस्तकालयों में बैठकर अपनी मेधा निखारनी चाहिए थी। लेकिन आज का तंत्र उन्हें ‘छात्र’ से ‘प्रदर्शनकारी’ बनने पर मजबूर कर रहा है।
समय आ गया है कि सरकार इस ‘लीक संस्कृति’ के रसूखदारों पर लगाम कसे। परीक्षा की शुचिता केवल कागजों पर या मंत्रियों के बयानों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर दिखनी चाहिए। यदि तंत्र अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सका, तो आने वाला इतिहास इस दौर को ‘सुनहरा काल’ नहीं, बल्कि ‘डिग्री-धारियों की बेरोजगारी और भविष्य के अपहरण का काल’ कहकर याद रखेगा।
युवाओं का धैर्य अब उस कगार पर है जहाँ से आक्रोश की ज्वाला निकलती है। सरकार को यह समझना होगा कि एक पीढ़ी का भविष्य ‘रद्द’ करके, किसी भी राष्ट्र की नियति कभी ‘पास’ नहीं की जा सकती।

