न्यूजलाइन नेटवर्क विशेष: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान से खलबली, कहा – “मेरे पूर्वज हिंदू थे”

न्यूजलाइन नेटवर्क विशेष: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान से खलबली, कहा – “मेरे पूर्वज हिंदू थे”

न्यूजलाइन नेटवर्क विशेष: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान से खलबली, कहा – “मेरे पूर्वज हिंदू थे”

न्यूज़लाइन नेटवर्क, डेस्क ब्यूरो 

नई दिल्ली/इस्लामाबाद: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक हालिया बयान ने पड़ोसी मुल्क में इतिहास और पहचान के मुद्दे पर एक नई बहस छेड़ दी है। एक टीवी साक्षात्कार के दौरान, ख्वाजा आसिफ ने न केवल अपने हिंदू पूर्वजों को स्वीकार किया, बल्कि पाकिस्तान की शिक्षण व्यवस्था और इतिहास लेखन पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।

अपने साक्षात्कार में ख्वाजा आसिफ ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके पूर्वज हिंदू थे। उन्होंने आगे दावा किया कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के पूर्वज भी हिंदू ही थे। आसिफ ने कहा:

“मेरे पूर्वज हिंदू थे, तो क्या इससे मैं कम पाकिस्तानी हो जाता हूं? मैं उतना ही कट्टर पाकिस्तानी हूं।”

रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान में पढ़ाई जा रही इतिहास की किताबों पर निशाना साधते हुए इसे ‘गलत इतिहास’ करार दिया। उन्होंने कहा:

सांस्कृतिक पहचान को मिटाया गया: आसिफ का आरोप है कि पाकिस्तान में हिंदू शासकों के गौरवशाली इतिहास को जानबूझकर मिटाया गया है। उन्होंने विशेष रूप से चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल हिंदू होने के कारण इन्हें पाठ्यक्रमों से हटा दिया गया।

भ्रमित करने वाली मानसिकता: उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर रखने के लिए एक विशेष मानसिकता के तहत इतिहास पढ़ाया जा रहा है, ताकि लोग यह मानने लगें कि उनके पूर्वज सऊदी अरब या ईरान से आए थे।

अपनी बात को पुख्ता करते हुए ख्वाजा आसिफ ने कश्मीर का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि किस तरह सूफी संतों द्वारा काश्मीरी हिंदुओं का धर्मांतरण किया गया और उनके पूर्वज भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा थे। उन्होंने स्वीकार किया कि उनका मूल हिंदू संस्कृति से ही जुड़ा हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आसिफ का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब पाकिस्तान पहले से ही आंतरिक पहचान के संकट और विदेशी कूटनीति के मोर्चे पर जूझ रहा है। जहां एक ओर यह बयान पाकिस्तान के कट्टरपंथी तबके को नागवार गुजर रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे देश में चल रहे ‘इतिहास और अस्मिता’ के विमर्श को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।

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