15 दस्तावेज भी नहीं आए काम: गुवाहाटी हाई कोर्ट ने असम के शख्स को घोषित किया ‘विदेशी’

गुवाहाटी: असम में नागरिकता से जुड़े एक मामले में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल सरकारी पहचान पत्र या कई सारे दस्तावेज जमा कर देना ही भारत की नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। कोर्ट ने कामरूप जिले के रहने वाले एक दिहाड़ी मजदूर, अमीनुल हक (Aminul Hoque) की याचिका को खारिज कर दिया, जिसे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (FT) पहले ही ‘विदेशी’ घोषित कर चुका था। अमीनुल ने ट्रिब्यूनल के 2019 के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 15 अलग-अलग सरकारी और कानूनी दस्तावेज पेश किए थे।
कोर्ट ने क्यों खारिज किए दस्तावेज?
जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 के तहत अपनी नागरिकता साबित करने का पूरा जिम्मा (Burden of Proof) उस व्यक्ति पर होता है जिसकी नागरिकता पर सवाल उठा है।
अदालत ने पाया कि अमीनुल द्वारा सौंपे गए दस्तावेजों में उनकी पारिवारिक वंशावली (Lineage) और तीन अलग-अलग गांवों (धोबाकुरा, घुगुदोबा और हाशदोबा) में उनके परिवार के रहने के दावों के बीच कोई स्पष्ट और अटूट लिंक (Continuous Trail) नहीं मिल रहा था।
पेश किए गए थे ये मुख्य दस्तावेज:
1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की डिजिटल कॉपी (जिसमें उनके दादा-दादी का नाम होने का दावा था)।
1966 से लेकर 2017 तक की विभिन्न वर्षों की मतदाता सूचियां (Voter Lists)।
साल 1973 के जमीन खरीद के कागजात (Land Deed)।
पैन कार्ड (PAN Card) और वोटर आईडी कार्ड (EPIC)।
स्कूल का सर्टिफिकेट।
पैन और वोटर कार्ड नागरिकता का सबूत नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक बार फिर यह साफ किया कि पैन कार्ड और वोटर आईडी कार्ड जैसे दस्तावेज केवल पहचान या पते के प्रमाण (Identity & Residence Proof) हो सकते हैं, इन्हें संवैधानिक रूप से भारत की नागरिकता का अकाट्य सबूत नहीं माना जा सकता।
इसके साथ ही कोर्ट ने अमीनुल द्वारा पेश की गई 1951 की एनआरसी की कंप्यूटर जनरेटेड कॉपी को भी साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) के नियमों के तहत प्रमाणित न होने के कारण अमान्य घोषित कर दिया।
पिता की गवाही भी नहीं आई काम: अमीनुल के पिता ने खुद अदालत में पेश होकर गवाही दी थी कि याचिकाकर्ता उनका ही बेटा है। इस पर कोर्ट ने कहा कि फॉरेनर्स एक्ट के मामलों में केवल मौखिक गवाही (Oral Testimony) तब तक काफी नहीं है, जब तक कि उसे साबित करने के लिए वैध और विश्वसनीय दस्तावेजी सबूत मौजूद न हों।
क्या था याचिकाकर्ता का तर्क?
अमीनुल के वकील ने दलील दी थी कि आधिकारिक रिकॉर्ड में उनके पिता और दादा के नामों की स्पेलिंग (वर्तनी) में कुछ मामूली गलतियां थीं, जिसकी वजह से ट्रिब्यूनल ने उन्हें विदेशी मान लिया। उन्होंने यह भी कहा कि ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव और बाढ़ के कारण उनके परिवार को समय-समय पर गांव बदलने पड़े थे, जिसके कारण अलग-अलग गांवों की वोटर लिस्ट में नाम आए।
अदालत ने कहा कि वह स्पेलिंग की छोटी-मोटी गलतियों को बड़ा मुद्दा नहीं बना रही है, लेकिन याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहा कि अलग-अलग गांवों की वोटर लिस्ट में दर्ज लोग एक ही परिवार के हिस्से थे। नदी के कटाव के कारण पलायन करने के दावे का भी कोई स्वतंत्र सरकारी दस्तावेज पेश नहीं किया जा सका।
हाई कोर्ट को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले में कोई कानूनी खामी नजर नहीं आई, जिसके बाद अमीनुल हक की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया गया।

