सोसाइटी फॉर एम्पावरमेंट द्वारा “जलवायु परिवर्तन और शहरी ऊष्मा द्वीप (अर्बन हीट आइलैंड्स)” विषय पर गोलमेज चर्चा का आयोजन

सोसाइटी फॉर एम्पावरमेंट द्वारा “जलवायु परिवर्तन और शहरी ऊष्मा द्वीप (अर्बन हीट आइलैंड्स)” विषय पर गोलमेज चर्चा का आयोजन

सोसाइटी फॉर एम्पावरमेंट द्वारा “जलवायु परिवर्तन और शहरी ऊष्मा द्वीप (अर्बन हीट आइलैंड्स)” विषय पर गोलमेज चर्चा का आयोजन

न्यूज़लाइन नेटवर्क,नई दिल्ली 

नई दिल्ली : सोसाइटी फॉर एम्पावरमेंट द्वारा 07 जून 2026 को “जलवायु परिवर्तन और शहरी ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Islands)” विषय पर एक ऑनलाइन गोलमेज चर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पारिस्थितिकी, मानवशास्त्र, साहित्य एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने भाग लिया तथा बढ़ते तापमान, शहरी ऊष्मा द्वीपों की समस्या तथा जलवायु अनुकूलन एवं लचीलापन (Climate Resilience) के सतत उपायों पर विचार-विमर्श किया।

मुख्य वक्ता डॉ. चंद्रशेखर हरिहरन, पारिस्थितिक अर्थशास्त्री, ने अपने उद्बोधन में कहा कि जलवायु परिवर्तन और तीव्र शहरीकरण के कारण विश्वभर में हीट वेव (लू) की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हो रही है। उन्होंने बढ़ते तापमान से उत्पन्न आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लागतों पर प्रकाश डालते हुए विकास योजनाओं तथा शहरी अवसंरचना में पारिस्थितिक दृष्टिकोण को समाहित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. सचिन्द्र नारायण, मानवशास्त्री, ने भारत की जनजातीय समुदायों द्वारा संरक्षित समृद्ध पारंपरिक ज्ञान-संपदा की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि सदियों से विकसित अनेक परंपरागत प्रथाएँ जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक गर्मी जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए व्यावहारिक एवं टिकाऊ समाधान प्रदान करती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक समाज इन समय-परीक्षित पर्यावरणीय प्रबंधन प्रणालियों से बहुत कुछ सीख सकता है।

डॉ. रुपेन्द्र कवि, मानवशास्त्री, साहित्यकार एवं समाजसेवी, ने जलवायु परिवर्तन के सांस्कृतिक आयामों पर चर्चा करते हुए कहा कि साहित्य, सामुदायिक सहभागिता और जन-जागरूकता पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु लचीलापन केवल तकनीकी उपायों से नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन से भी संभव है।

श्री गोपी किशन सोनी, प्रकृतिविद्, ने शहरी ऊष्मा द्वीपों के जैव विविधता, जल संसाधनों और जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा की। उन्होंने जलवायु-संवेदनशील शहरों के निर्माण के लिए हरित क्षेत्रों, शहरी वनों, आर्द्रभूमियों तथा प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

चर्चा का एक प्रमुख विषय जलवायु संबंधी चुनौतियों के समाधान में आदिवासी एवं स्वदेशी ज्ञान की प्रासंगिकता रहा। वक्ताओं ने छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और उत्तर-पूर्वी राज्यों के जनजातीय समुदायों के उदाहरण प्रस्तुत किए, जहाँ मिट्टी, बाँस तथा स्थानीय संसाधनों से निर्मित पारंपरिक आवास प्राकृतिक शीतलता और तापीय आराम प्रदान करते हैं। गोंड, बैगा, संथाल, उरांव, अपातानी, खासी तथा नागा जैसे समुदायों ने ऐतिहासिक रूप से सामुदायिक जल प्रबंधन, पवित्र उपवनों (Sacred Groves) के संरक्षण, कृषि-वनीकरण (Agroforestry) तथा जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाया है।

चर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि पारंपरिक आहार पद्धतियाँ अत्यधिक गर्मी की परिस्थितियों में सामुदायिक लचीलापन बढ़ाने में सहायक होती हैं। कोदो, कुटकी और रागी जैसे मोटे अनाज (मिलेट्स), वन्य फल, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, बाँस की कोपलें तथा अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थ पोषण प्रदान करते हैं और अपेक्षाकृत कम प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता रखते हैं। वक्ताओं ने कहा कि ये परंपरागत जीवन-पद्धतियाँ आधुनिक शहरी नियोजन के लिए भी उपयोगी सीख प्रदान करती हैं, विशेषकर निष्क्रिय शीतलन (Passive Cooling), जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण तथा सतत उपभोग के क्षेत्रों में।

प्रतिभागियों ने बढ़ती गर्मी के कारण शहरी आबादी, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों, बाहरी कार्य करने वाले श्रमिकों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की बढ़ती संवेदनशीलता पर चिंता व्यक्त की। पैनल ने शहरी ऊष्मा द्वीपों के प्रभावों को कम करने के लिए साक्ष्य-आधारित नीतिनिर्माण, जलवायु-संवेदनशील शहरी डिजाइन, हरित अवसंरचना के विस्तार तथा व्यापक जन-जागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया।

सोसाइटी फॉर एम्पावरमेंट ने पर्यावरणीय स्थिरता, जलवायु लचीलापन, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों तथा समावेशी विकास से संबंधित विषयों पर संवाद, अनुसंधान और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। संस्था ने भविष्य में उभरती पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान और समाज की जलवायु अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ करने में पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान की भूमिका पर और अधिक कार्य करने की योजना व्यक्त की।

कार्यक्रम का समापन एक संवादात्मक सत्र तथा सभी विशिष्ट वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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