लोकतंत्र की दहलीज पर मुंगेली की ‘स्वायत्त जागीर’: जब सूचना के अधिकार को सरहदों में बांधने की जुगत हुई
जनपद पंचायत मुंगेली


न्यूजलाइन नेटवर्क,डेस्क ब्यूरो
रायपुर : मुंगेली जनपद पंचायत के नीति-नियंताओं ने लोकतंत्र के स्थापित सिद्धांतों को पीछे छोड़ते हुए ग्राम स्वराज्य की एक सर्वथा मौलिक, भौगोलिक और संकीर्ण परिभाषा गढ़ दी है। स्थानीय ग्राम पंचायतों के हुक्मरानों का नया फरमान है कि लोकतंत्र में सूचना की रोशनी केवल गांव की चौहद्दियों तक ही सीमित रहनी चाहिए। बाहर का कोई नागरिक—विशेषकर गैर-जनपद का पत्रकार—यदि सूचना का अधिकार (RTI) कानून लेकर उनकी दहलीज पर पहुंचे, तो उसे विकास में हिस्सेदारी नहीं, बल्कि क्षेत्राधिकार का घोर उल्लंघन माना जाएगा।
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत देश के किसी भी नागरिक को सार्वजनिक कार्यों की जानकारी लेने का अधिकार प्राप्त है। परंतु मुंगेली के परिप्रेक्ष्य में यह कानून अपनी प्रासंगिकता खोता नजर आता है। यहां तर्क यह गढ़ा जा रहा है कि ‘हमारे गांव की दीवारें, हमारे ही खातों का हिसाब रखेंगी।’ जब भी कोई पत्रकार या जागरूक नागरिक विकास कार्यों की जमीनी हकीकत, उपयोगिता प्रमाण-पत्र और सार्वजनिक धन के व्यय का ब्योरा मांगता है, तो पारदर्शिता से मुखातिब होने के बजाय एक सुर में सामूहिक शिकायती स्वर गूंज उठते हैं। पूछने वाले पर अवैध उगाही और मानसिक प्रताड़ना का तमगा चस्पा कर दिया जाता है, मानो सवालों का उठना ही किसी अपराध की श्रेणी में आता हो।
यदि मुंगेली जनपद पंचायत के कर्णधारों के इस ‘क्षेत्रीय एकाधिकार’ के सिद्धांत को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जाए, तो शासन और समाज को भी इस पर पूरी निष्ठा से अमल करना चाहिए:
यदि देश और प्रदेश के अन्य नागरिकों को यह जानने का हक नहीं है कि मुंगेली की पंचायतों में राशि कहां खर्च हुई, तो राज्य और केंद्र सरकार को भी अन्य क्षेत्रों के नागरिकों के कर (टैक्स) से अर्जित राजस्व मुंगेली को देना बंद कर देना चाहिए। मुंगेली जनपद में केवल उसी धन से विकास कार्य हों,जो विशुद्ध रूप से स्थानीय निवासियों के कर से जमा हुआ हो। जब पारदर्शिता पर स्थानीय पहरा है,तो वित्तीय संप्रभुता भी केवल स्थानीय ही होनी चाहिए।
’क्षेत्रीय संप्रभुता’ के इस दर्शन को आजीविका पर भी लागू किया जाना चाहिए। मुंगेली क्षेत्र का कोई भी नागरिक या प्रतिनिधि अपने जनपद की सीमाओं को लांघकर दूसरे क्षेत्रों में रोजगार, व्यापार या नौकरी न करे। जब सूचना की सीमाएं तय हैं, तो रोजी-रोटी की सीमाएं भी केवल उसी जनपद तक सीमित रहनी चाहिए।
सूचना के अधिकार से यह अप्रत्याशित खौफ स्वतः इंगित करता है कि बही-खातों की सिलवटों में कुछ ऐसा है जिसे सार्वजनिक धूप से बचाना आवश्यक है। ऐसे में शासन की शीर्ष वित्तीय एजेंसियों द्वारा मुंगेली जनपद के समस्त निर्माण कार्यों, मस्टररोलों और सामग्री क्रय की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए।
जवाबदेही से बचने की इस संगठित प्रवृत्ति की जड़ें तलाशने के लिए सभी ग्राम पंचायत सचिवों और संबंधित मैदानी अधिकारियों की घोषित व अघोषित चल-अचल संपत्तियों का एक स्वतंत्र और निष्पक्ष विधिक अंकेक्षण (ऑडिट) होना समय की मांग है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पंचायतें जवाबदेह संस्थाएं हैं, कोई सामंती रियासतें नहीं जहां राजा की मर्जी ही कानून हो। सार्वजनिक धन किसी की निजी बपौती नहीं,बल्कि जन-जन के पसीने से उपजा राजस्व है। जब सूचना मांगने वाले को सामूहिक दबाव से घेरा जाने लगे, तो यह सिद्ध हो जाता है कि सवाल गलत नहीं था, बल्कि वह ठीक उसी नस पर पड़ा है जहां से व्यवस्था की असहजता शुरू होती है।

